Shakl

शक्ल जब बस गई आँखों में तो छुपना कैसा
दिल में घर करके मेरी जान ये परदा कैसा

Nigah

सोचा था नही करेगे कभी किसी से मोहब्बत…
पर तुम्हारी उन निगाहो ने…
मेरे दिल को ही मेरे खिलाफ कर दिया…